श्राद्ध का अर्थ और महत्व: कर्म , प्रकार , मुख्य नियम और सावधानियां

What are the benefits of doing shradh?

हिन्दू धर्म में ‘श्राद्ध’ अपने दिवंगत पूर्वजों (पितरों) के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण विधान है पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं।

श्राद्ध का अर्थ और महत्व 

  • श्राद्ध की परिभाषा: ‘श्रद्धा’ शब्द से ही ‘श्राद्ध’ बना है। पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ अपने पितरों की तृप्ति और शांति के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं।
  • पितृ पक्ष की अवधि: हिन्दू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा या आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक के 16 दिनों को पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) कहा जाता है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर (सर्वपितृ अमावस्या) तक है
  • धार्मिक मान्यता: मान्यता है कि इन 16 दिनों में पूर्वज सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर अपने परिजनों के पास आते हैं। उनके निमित्त तर्पण और पिंडदान करने से वे तृप्त होते हैं और परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

Shradh 2019 : श्राद्ध से जुड़ी यह 15 जानकारियां आपकी आंखें खोल देंगी। shradh  Information - Pitru Paksha 2019 | Webdunia Hindi

मुख्य नियम और सावधानियां

  • तिथि का महत्व: श्राद्ध हमेशा पूर्वज की मृत्यु की तिथि (हिन्दू पंचांग के अनुसार) के दिन ही किया जाता है।
  • अज्ञात तिथि: यदि किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो आश्विन अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध किया जा सकता है।
  • खानपान: पितृ पक्ष के दौरान सात्विक भोजन करने, लहसुन-प्याज व तामसिक भोजन (मांस-मदिरा) से बचने की परंपरा है।
  • शुभ कार्य: इन 16 दिनों में नए मांगलिक कार्य (जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि) आमतौर पर नहीं किए जाते हैं।

विशेष पौराणिक महत्व…

व्यक्ति जब देह छोड़ता है तो जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति की स्थिति अनुसार तीन दिन के भीतर वह पितृलोक चला जाता है। इसीलिए ‘तीज’ मनाई जाती है। कुछ आत्माएं 13 दिन में पितृलोक चली जाती हैं, इसीलिए त्रयोदशाकर्म किया जाता है और कुछ सवा माह अर्थात 37वें या 40वें दिन। फिर एक वर्ष पश्चात तर्पण किया जाता है। पितृलोक के बाद उन्हें पुन: धरती पर कर्मानुसार जन्म मिलता है

हमारे जो पूर्वज पितृलोक नहीं जा सके या जिन्हें दोबारा जन्म नहीं मिला ऐसी अतृप्त  आत्माओं के लिए अंतिम बार एक वर्ष पश्चात ‘गया’ में मुक्ति-तृप्ति का कर्म तर्पण और पिंडदान किया जाता है। गया के अतिरिक्त और कहीं भी यह कर्म नहीं होता है। उक्त स्थान का विशेष वैज्ञानिक महत्व है।

यजुर्वेद में कहा गया है कि शरीर छोड़ने के पश्चात्य, जिन्होंने तप-ध्यान किया है वे ब्रह्मलोक चले जाते हैं  सतकर्म करने वाले भक्तजन स्वर्ग चले जाते हैं। स्वर्ग अर्थात वे देव बन जाते हैं। राक्षसी कर्म करने वाले कुछ प्रेत योनि में अनंतकाल तक भटकते रहते हैं और कुछ पुन: धरती पर जन्म ले लेते हैं। जन्म लेने वालों में भी जरूरी नहीं कि वे मनुष्य योनि में ही जन्म लें। इससे पूर्व ये सभी पितृलोक में रहते हैं वहीं उनका न्याय होता है।
उक्त सभी हमारे पितर हैं। इस तरह जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं भी जानते हैं सभी के लिए हम अन्न-जल को अग्नि को दान करते हैं। अग्नि उक्त अन्न-जल को हमारे पितरों तक पहुंचाकर उन्हें तृप्त करती है।
सूर्य की सहस्त्रों किरणों में जो सबसे प्रमुख है उसका नाम ‘अमा’ है। उस अमा नामक प्रधान किरण के तेज से सूर्य त्रैलोक्य को प्रकाशमान करते हैं। उसी अमा में तिथि विशेष को चन्द्र (वस्य) का भ्रमण होता है तब उक्त किरण के माध्यम से चंद्रमा के उर्ध्वभाग से पितर धरती पर उतर आते हैं इसीलिए श्राद्धपक्ष की अवावस्या तिथि का महत्व भी है।
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पितरों का परिचय
पुराणा अनुसार मुख्यत: पितरों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-दिव्य पितर और मनुष्य पितर।
दिव्य पितर  – जीवधारियों के कर्मों को देखकर मृत्यु के बाद उसे क्या गति दी जाए, इसका निर्णय करता है।  प्रधान यमराज है। अत: यमराज की गणना भी पितरों में होती है। काव्यवाडनल, सोम, अर्यमा और यम- ये चार मुख्य गण प्रथान हैं।
श्राद्ध के नियम :- श्राद्ध पक्ष में व्यसन और मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है। पूर्णत: पवित्र रहकर ही श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। रात्रि में श्राद्ध नहीं किया जाता। श्राद्ध का समय दोपहर साढे बारह बजे से एक बजे के बीच उपयुक्त माना गया है। कौओं, कुत्तों और गायों के लिए भी अन्न का अंश निकालते हैं क्योंकि ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं। दों अनुसार इससे पितृऋण चुकता होता है
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पितृदोष से मुक्ति :-

पूर्वजों के कार्यों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ी पर पड़ने वाले अशुभ प्रभाव को पितृदोष कहते हैं। पितृदोष का अर्थ यह नहीं कि कोई पितृ अतृप्त होकर आपको कष्ट दे रहा है। पितृदोष का अर्थ वंशानुगत, मानसिक और शारीरिक रोग और शोक भी होते हैं।
घर और बाहर जो वायु है वह सभी पितरों को धूप, दीप और तर्पण देने से शुद्ध और सकारात्मक प्रभाव देने वाली होती है। इस धूप, श्राद्ध और तर्पण से पितृलोक के तृप्त होने से पितृदोष मिटता है। पितरों के तृप्त होने से पितर आपके जीवन के दुखों को मिटाते हैं। पितृयज्ञ और पितृदोष एक वैज्ञानिक धारणा है।

 

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