सोशल मीडिया पर जातिसूचक टिप्पणी करना भी एससी-एसटी एक्ट के दायरे में: कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया
अनुसूचित जाति समुदाय से जुड़े शिकायतकर्ता ने रबिउल इस्लाम बुलबुल और सायन दत्त के खिलाफ बेहाला थाने में शिकायत की थी। आरोप था कि दोनों ने फेसबुक पर उनकी जाति, धर्म और परिवार को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। शिकायतकर्ता ने पोस्ट के स्क्रीनशॉट के साथ शिकायत दर्ज कराई थी।
न्यायमूर्ति उदय कुमार की एकल पीठ ने कहा कि कानून के तहत “सार्वजनिक दृश्य” (public view) की शर्त केवल भौतिक स्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सोशल मीडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म तक भी विस्तारित है
वर्ष 2022 में मामला दर्ज होने के बाद पुलिस ने गुप्त बयान, गवाहों के बयान और फेसबुक लिंक की जांच की। हालांकि, 20 जनवरी 2023 को पुलिस ने जांच में कोई सूत्र नहीं मिलने का हवाला देते हुए ‘नील’ फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।
पुलिस का कहना था कि साइबर थाने के माध्यम से फेसबुक से यूजर की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन कंपनी से जानकारी नहीं मिली। अलीपुर की विशेष अदालत ने शिकायतकर्ता की आपत्ति खारिज करते हुए पुलिस रिपोर्ट स्वीकार कर ली थी।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून के तहत कार्रवाई केवल सड़क, बाजार या किसी सार्वजनिक स्थान पर किए गए अपमान तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर जातिसूचक गाली भी इस कानून के दायरे में आ सकती है।
साइबर विशेषज्ञ करेंगे जांच
अदालत के आदेश में कहा गया कि एससी-एसटी कानून में ‘जनसमक्ष अपमान’ की अवधारणा सोशल मीडिया जैसे डिजिटल मंचों तक भी लागू हो सकती है। कानून की संबंधित धाराओं में अनुसूचित जाति-जनजाति के व्यक्ति को जानबूझकर अपमानित या भयभीत कर सार्वजनिक रूप से अपमानित करने पर दंड का प्रावधान है।

