अकेले मेधा रूपम को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता’, छात्र के NSA मामले में 5 लाख रुपये के जुर्माने पर SC की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) मेधा रूपम को उस बड़ी फैसला लेने की प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता जिसके तहत स्टूडेंट प्रोटेस्टर आकृति चौधरी को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली रूपम की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एससी शर्मा और एनके सिंह की बेंच ने कहा कि अगर फैसला लेने की प्रक्रिया ऊपर से नीचे तक चली थी तो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम उन पर 5 लाख रुपये का जुर्माना नहीं लगा सकते।” उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि डीएम ने उन रिपोर्टों के आधार पर कार्रवाई की थी जो उन तक पहुंचने से पहले एसएचओ, डीसीपी और कमिश्नर से गुजरी थीं। उन्होंने यह भी बताया कि एनएसए एडवाइजरी बोर्ड ने हिरासत के मामले की समीक्षा की थी। रूपम की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि डीएम द्वारा हिरासत का आदेश जारी करने से पहले पांच चरण थे और कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन करने के बाद उनकी भूमिका केवल राय बनाने की थी।
हाई कोर्ट ने पाया कि हिरासत राज्य द्वारा गढ़ी गई कहानी पर आधारित थी और आदेश दिया कि अगर किसी अन्य मामले में उनकी जरूरत न हो तो चौधरी को तुरंत रिहा किया जाए। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि रूपम की सैलरी से 5 लाख रुपये का मुआवजा काटा जाए और निर्देश दिया कि डीएम और डॉसियर तैयार करने में शामिल पुलिस अधिकारियों के प्रति कोर्ट की नाराजगी उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रूपम को यह चेतावनी भी दी थी कि मनमानी करने वाली नौकरशाही का लगातार तानाशाही वाला रवैया उत्तर प्रदेश को एक ऐसी जगह बना सकता है जहां लोगों पर हर समय नजर रखी जाती है और उनका दमन किया जाता है।


